झूठ
कहते हॅ की झूठ के पाव नही होते और झूठ छुपता जरुर हॅ मगर कुछ समय के लिये झूठ कितना हॅ इस बात पर उसके छुपाने कि निर्भरता होती हॅ क्योंकि कुछ छोटी गलती छुपाने के लिये झूठ बोला जाना तो छुप सकता हॅ लेकिन जब किसी इन्सान को धोखा देने के लिये झूठ बोला जाता हॅ तो वह ज्यादा समय तक नही छुप पाता हॅ यह भी
कहा जाता हॅ कि झूठ कि आयु ज्यादा नही होती हॅ
लेकिन लोग सच छुपाने के लिये बहाने बनाकर झूठ पर झूठ बोलते हॅ लेकिन असली आनन्द तो तब आता हॅ जब उस इन्सान को पता चल जाता हॅ जिससे झूठ बोला जा रहा होता हॅ त्था वह इन्सान बिना किसी बातचीत के दुसरे इन्सान का झूठ जानने के बाद भी उसके झूठ बोलने कि सीमा देखता हॅ
बहाना बनाकर झूठ बोलने वाला व्यक्ति यह समझता हॅ कि हम जिससे झूठ बोल रहे हॅ वह नादान हॅ बेवकूफ हॅ लेकिन जब दुसरे व्यक्ति को सच पता लगने लगता हॅ और वह झूठ बोलने वाले व्यक्ति कि क्षमता देखता हॅ तो
झूठ बोलने वाले व्यक्ति का मान्- सम्मन धीरे- धीरे नश्ट होने लगता हॅ
झूठ का एक पहलू यह भी हॅ कि जब हम किसी व्यक्ति को झूठ बोलते हॅ और जब हमें इस बात का एहसास होता हॅ तो उस एहसास के होने से पहले ही दुसरा व्यक्ति हम पर भरोसा करना छोड चुका होता हॅ और हम आत्म समर्पण भी कर ले तो वह भरोसा पुरी तरह वापस नही
कहते हॅ की झूठ के पाव नही होते और झूठ छुपता जरुर हॅ मगर कुछ समय के लिये झूठ कितना हॅ इस बात पर उसके छुपाने कि निर्भरता होती हॅ क्योंकि कुछ छोटी गलती छुपाने के लिये झूठ बोला जाना तो छुप सकता हॅ लेकिन जब किसी इन्सान को धोखा देने के लिये झूठ बोला जाता हॅ तो वह ज्यादा समय तक नही छुप पाता हॅ यह भी
कहा जाता हॅ कि झूठ कि आयु ज्यादा नही होती हॅ
लेकिन लोग सच छुपाने के लिये बहाने बनाकर झूठ पर झूठ बोलते हॅ लेकिन असली आनन्द तो तब आता हॅ जब उस इन्सान को पता चल जाता हॅ जिससे झूठ बोला जा रहा होता हॅ त्था वह इन्सान बिना किसी बातचीत के दुसरे इन्सान का झूठ जानने के बाद भी उसके झूठ बोलने कि सीमा देखता हॅ
बहाना बनाकर झूठ बोलने वाला व्यक्ति यह समझता हॅ कि हम जिससे झूठ बोल रहे हॅ वह नादान हॅ बेवकूफ हॅ लेकिन जब दुसरे व्यक्ति को सच पता लगने लगता हॅ और वह झूठ बोलने वाले व्यक्ति कि क्षमता देखता हॅ तो
झूठ बोलने वाले व्यक्ति का मान्- सम्मन धीरे- धीरे नश्ट होने लगता हॅ
झूठ का एक पहलू यह भी हॅ कि जब हम किसी व्यक्ति को झूठ बोलते हॅ और जब हमें इस बात का एहसास होता हॅ तो उस एहसास के होने से पहले ही दुसरा व्यक्ति हम पर भरोसा करना छोड चुका होता हॅ और हम आत्म समर्पण भी कर ले तो वह भरोसा पुरी तरह वापस नही