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काँच के दर्पण में अपना मुख दिखा तो काया की दिव्य शोभा देखकर मनुष्य फूला न समाया। पर जब अपने आचरण को देखा तो घृणा और लज्जा से सिर नीचे झुक गया। शरीर इतना सुन्दर और मन इतना कुरूप। विश्व के दर्पण में अपना मुख देखा तो अहंकार गल गया। कहाँ इस जगत की चिन्तन से परे विशालता और कहाँ मैं नगण्य सा तुच्छ राज कण।

और भी गहराई में प्रवेश कर जब अपने अन्तरात्मा, जीवन सौभाग्य...


Akhandjyoti Jul(1987)