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आत्म कल्याण की इच्छा से महाराज अजातशत्रु ने तप करने का निश्चय किया। लोगों ने बताया इससे पूर्व कि आप कोई साधना प्रारम्भ करें एक मार्गदर्शक गुरु वरण करना आवश्यक है। बिना गुरु के साधनाएँ सफल नहीं होती। अजातशत्रु ने यह बात मान ली पर अब एक नई समस्या उठ खड़ी हुई कि गुरु किसे बनाया जाये? लोगों ने यह बताया था कि गुरु बनने का अधिकारी वही होता है जो परमार्थी और तत्त्वदर्शी हो। किस कसौटी पर...
Akhandjyoti Jul(1969)