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इंजीनियर अमृतलाल ठक्कर की नियुक्ति बम्बई कारपोरेशन में उच्च पद पर हुई थी। उस बीच उन्हें मेहतरों के मुहल्लों में काम कराना पड़ा। उनको दयनीय स्थिति देखकर उनने विचारा कि ऊँचे वेतन के लिए नौकरी करने के स्थान पर यह अच्छा है कि इन पिछड़े लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया जाय।
बापा ने नौकरी छोड़ दी। गान्धी जी के साथ हो लिए और जीवन भर हरिजनों, आदिवासियों तथा
पिछड़े लोगों की सेवा में...
Akhandjyoti Feb(1993)