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अमृतपान की अभिलाषा में उत्तुंग मुनि कठोर तप करने लगे। समयानुसार इन्द्र प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहने लगे । उत्तुंग ने अपना मनोरथ कह सुनाया।
इन्द्र यह कहकर अंतर्ध्यान हो गये कि-”जल्द ही आपका मनोरथ पूर्ण होगा। जो कमी है, उसे तब तक और पूरा कर लें।”
बहुत दिन बीत गए, उमंग तीर्थ प्रव्रज्या पर निकले। मरुभूमि का लम्बा क्षेत्र मार्ग में आ गया। पानी का कोई प्रबन्ध ही नहीं था। गला सूखने...
Akhandjyoti Oct(1996)