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कितने ही धर्म प्रेमी हसीदी धर्मगुरु बालशेम के पास जाकर आग्रह करने लगे—’गुरु देव! आपके शिष्य यहीएल मिरवाल से हम लोग कई बार गुरु का पद स्वीकार करने के लिए कह चुके हैं, पर वह हर बार अनसुनी कर देते हैं। यदि आप उनसे कहें तो सम्भवतः आपके आदेश की अवहेलना वह न कर सकेंगे।’
धर्मगुरु बालशेम ने मिरवाल को बुलाकर कहा− ‘तुम्हें अपनी जिद छोड़ देनी चाहिए। जानते हो मेरे आदेश की अवहेलना तुम्हें न इस...
Akhandjyoti Jul(1974)