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महर्षि याज्ञवलक्य के बाल्यकाल का प्रसंग है। वे नारायण तीर्थ नामक स्थान में महर्षि विदग्ध शाकल्य के आश्रम में ऋग्वेद का ज्ञान पा रहे थे। आनर्त राष्ट्र के नरेश सुप्रिय एक दिन आश्रम में आए व कुछ दिन ऋषि मुनियों के सत्संग में रहने की इच्छा व्यक्त की। महर्षि विदग्ध ने याज्ञवलक्य की नियुक्ति राजा को नित्य अभिषेक कर आशीर्वाद देने के लिए कर दी।

तीसरे दिन याज्ञवलक्य राजा के पास पहुँचे तो राजा नित्यकर्म से निवृत्त...


Akhandjyoti Oct(1991)