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महाराज प्रद्युम्न का स्वर्गवास हो गया। सारा परिवार बहुत दुखी था। उन दिनों आचार्य पुरंध्र को सिद्धपुरुषों में गिना जाता था। समझा जाता था कि वे मृत को भी अपने मंत्रबल से जीवित कर सकते हैं।
पुरंध्र को पालकी में बिठाकर लाया गया। मृत को जिलाने का आग्रह लगा तो बेतुका, पर आतुरों का समाधान करने के लिए उनने सूझ−बूझ से काम लिया और कहा कि यदि मृतात्मा चाहेगी, तो वही वे पुनर्जीवित करने का काम...
Akhandjyoti Jan(2003)