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हजरत अबूबक सिद्धीकी मदीना के खलीफा बनाये गये। प्रश्न यह उठा कि उनको निर्धारित वेतन कितना मिले।
चूँकि उनके पूर्ववर्ती खलीफी का कोई वेतन नियत न था। वे आवश्यकतानुसार खर्च ले लिया करते थे। कोई नियत निर्धारण न था पर अब तो एक परम्परा बनाने की आवश्यकता पड़ी।
हजरत से कहा गया कि वे ही अपना वेतन निर्धारित कर लें। उनने उत्तर दिया इस क्षेत्र के साधारण मजदूरों को जो वेतन मिलता है वह...
Akhandjyoti Nov(1991)