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एक दुरात्मा था। नित्य महात्मा के पास जाता और पूछता-दुष्टता का स्वभाव कैसे छूटे?
महात्मा टालते रहे। एक दिन उनने उसकी हस्त रेखा देखी और विश्वास दिलाया, अब तुम्हारा अन्त आ गया। एक महीने से अधिक जीना न हो सकेगा। दुरात्मा चिन्ता में डूब गया। एक महीना दुःख, भय, पश्चाताप और भजन में लगा रहा। भविष्य में होने वाली दुर्गति ही मस्तिष्क पर छाई रही।
एक महीने में एक दिन शेष रहा तो महात्मा ने...
Akhandjyoti Mar(1987)