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इसके लिए सबसे बड़ी वैतरणी जो पार करनी पड़ती है, वह है-मोह-माया की। देवर्षि नारद को परिभ्रमण काल में एक वयोवृद्ध धनवान् मिला। पूजा बहुत करता था, भक्तजन लगता था। उसकी ढलती आयु को देखकर नारद बोले - "परिवार समर्थ हो गया, अब घर से निकल कर वानप्रस्थ लेना चाहिए और लोकसेवा में लगना चाहिए, बात धनवान् के गले न उतरी। उसने कहा-अभी तो परिवार को सम्पन्न बनाना है। फिर कभी समय होगा, तो चलेंगे।" बहुत वर्ष बाद...


Akhandjyoti Oct(1995)