Yunan-o-Misr-o-Roma Sab Mit Gaye Jahan Se, Ab Tak Magar Hai Baki Naam-o-Nishan Hamara, Kuchh Baat Hai Ke Hasti Mit’ti Nahin Hamari, Sadiyon Raha Hai Dushman Daur-e-Zaman Hamara
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गुरुगोविन्द सिंह निविड़ वन में बैठे एकान्त चिंतन में लीन थे। उनके मन में देश, समाज, संस्कृति के उत्थान और कल्याण के लिए विचारो की लहरे उठ रही थी। उनका प्रवाह नीचे वेगवती यमुना के प्रवाह से तेज था।
तभी गुरु ने देखा यमुना को पार कर उनका शिष्य उनकी ओर आ रहा है। निकट आने पर उसे पहचाना - उस शिष्य का नाम था रघुनाथ। काफी सम्पन्न और ऐश्वर्यशाली । उसे अपनी धन...
Akhandjyoti Feb(1996)