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५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने विविध मंचों से किया आह्वान

नैतिकता, त्याग, परोपकार की संस्कृति को अपनायें- डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी
डॉ. चिन्मय पण्ड्या, प्रतिकुलपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने विविध मंचों से किया आह्वान

५१ कुंडीय गायत्री महायज्ञ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
लखनऊ के आशियाना कथा पार्क सेक्टर- जे में ५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ सम्पन्न हुआ। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी के आगमन ने इस महायज्ञ की गरिमा बढ़ा दी। उन्होंने अपने ८ एवं ९ दिसम्बर के लखनऊ प्रवास में यज्ञ के अलावा कुछ और कार्यक्रमों को भी संबोधित किया।

५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में
८ दिसम्बर की सायं उत्तर प्रदेश के विधानसभा, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष श्री हृदय नारायण दीक्षित की मुख्य उपस्थिति में उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं को ऐसा आदर्श जीवन जीना चाहिए जिसे देखकर समाज प्रेरणा ले सके, यही समय की माँग है। उन्होंने याजकों से कहा कि यज्ञ त्याग और परमार्थ का देवता है। यज्ञ में आहुतियाँ समर्पित करते हुए जीवन को भोग विलास से बचाकर लोगमंगल में लगाने का संकल्प करना चाहिए।

इससे पूर्व डॉ. चिन्मय जी ने श्री हृदयनारायण दीक्षित जी का गायत्री मंत्र चादर उढ़ाकर भावभरा स्वागत किया। श्री दीक्षित जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि गायत्री परिवार ने समाज को संस्कारवान वातावरण दिया है। आपका त्याग राष्ट्र की गौरव- गरिमा बढ़ायेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

२८३वीं वाङ्मय स्थापना
८ दिसम्बर को डॉ. चिन्मय जी द्वारा रामस्वरूप फैकल्टी आॅफ हूमैनिटीज़ एण्ड सोशल साइंस रामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी, लखनऊ के पुस्तकालय में युगऋषि के समग्र वाङ्मय की स्थापना की गयी। गायत्री ज्ञान मंदिर लखनऊ द्वारा चलाये गये अभियान के अंतर्गत यह २८३वें पुस्तकालय में समग्र वाङ्मय सेट की स्थापना हुई। श्रीमती ऊषा सिंह ने अपने स्व. पति राजेन्द्र सिंह की स्मृति में यह साहित्य भेंंट किया था। डॉ. नरेन्द्र देव ने १००० पॉकेट बुक एवं श्री उमानंद शर्मा ने सभी संकाय सदस्यों को

अखण्ड ज्योति पत्रिकाएँ भेंट कीं। डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने इस अवसर पर कहा कि मानवीय मूल्य के विकास के बिना शिक्षा अधूरी है। युगऋषि का यह साहित्य इस अधूरेपन को दूर कर जीवन की गरिमा का बोध करायेगा।

चिकित्सकों को मार्मिक संदेश दिया
के.जी.एम.यू. लखनऊ के सांइटिफिक कन्वेशन सेन्टर में कुलपति, वरिष्ठ चिकित्सक एवं चिकित्सा की शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र- छात्राओं के बीच डॉ. चिन्मय जी का उद्बोधन हुआ। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत के जगद्गुरु एवं सोने की चिड़िया रहने पर हम सब गर्व करते हैं, लेकिन हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत ने ऋषियों की सेवा, प्रेम, त्याग की संस्कृति को अपनाकर ही यह गौरव हासिल किया था। उन्होंने अपने युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का संदेश देते हुए चिकित्सकों से पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अपने समय, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश लगाने का अनुरोध चिकित्सकों से किया।

डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ने वीसी सहित सभी विभागाध्यक्षों को गायत्री मंत्र का उपवस्त्र उढ़ाकर सम्मानित किया। सभी ६०० श्रोताओं को युगऋषि का साहित्य भेंट किया गया। कुलपति जी ने प्रतीक चिन्ह भेंट देकर शांतिकुंज प्रतिनिधि का सम्मान किया। इस अवसर पर उन्होंने के.जी.एम.यू. परिसर में शांतिकुंज के सहयोग से नक्षत्र वाटिका लगाने की घोषणा की।

महायज्ञ के उल्लेखनीय प्रसंग
• यज्ञस्थल पर २ से ९ दिसम्बर की तारीखों में युगऋषि के जीवन दर्शन पर प्रदर्शनी एवं पुस्तक मेला लगाया गया था।
• कार्यक्रम सम्पन्न कराने शांतिकुंज से श्री श्याम बिहारी दुबे की पाँच सदस्यीय टोली पहुँची थी। भारी मात्रा में नर- नारियों ने मानव एवं प्राणीमात्र के कल्याण तथा विश्व शान्ति की कामना के साथ आहुतियाँ समर्पित कीं, सभी संस्कार सम्पन्न कराये गये। कार्यकर्ता गोष्ठी हुई, सायंकालीन संगीत- प्रवचन के कार्यक्रमों ने हजारों लोगों में युगनिर्माणी आस्थाओं का संचार किया।
• रक्तदान एवं देहदान : एस.जी.पी.जी.आई. लखनऊ की देखरेख में यज्ञ परिसर में रक्तदान शिविर चला, जिसमें २४ लोगों ने रक्तदान किया। ३८ लोगों ने मरणोपरान्त देहदान करने का संकल्प लिया।
• सर्वश्री अरविन्द निगम, अमरनाथ दुबे, उमानंद शर्मा, अशोक द्विवेदी, अनिल तिवारी, सुरेन्द्र सिंह, डॉ. आर.पी. गुप्ता, ललित दीक्षित, श्रीमती क्षमा गुप्ता, पूनम शर्मा, डॉ. एस.एन. सचान, के.के. श्रीवास्तव, अरूण श्रीवास्तव, माधुरी पाण्डेय, सुरेन्द्र बाबू प्रजापति, राहुल मिश्रा, शिवाकांत त्रिपाठी, ज्ञान श्रीवास्तव, आशुतोष सिंह तथा लखनऊ के आठों जोनों के कार्यकर्त्ताओं के सहयोग से यह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

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