शिष्य के अधूरेपन को पूरा करता है सद्गुरु : डॉ. पण्ड्याजी
भाव संवेदना की मूर्ति है सद्गुरु : शैलदीदीजी
हरिद्वार ९ जुलाई।
गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि सद्गुरु अपने शिष्य की पात्रता को विकसित करने के साथ उसके जीवन के अधूरेपन को दूर करने का कार्य करता है। सद्गुरु के ज्ञान का कोष सदैव भरा रहता है। वह ज्ञानवान, विवेकशील एवं भावनाओं से परिपूर्ण होता है।
श्रद्धेय डॉ. पण्ड्याजी गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में आयोजित गुरुपूर्णिमा पर्वोत्सव के प्रमुख कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर देश- विदेश के कई हजार अनुयायी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि सद्गुरु अपने शिष्य के प्रारब्ध को काटने वाला, साधनात्मक ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाला होता है। सद्गुरु दृश्य व अदृश्य जगत के ज्ञाता होते हैं और अपने शिष्यों को आने वाली समस्याओं से बचाते भी हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस, श्रीअरविन्द, महर्षि रमण, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी अपने शिष्यों को भवसागर से पार कराने वाले सद्गुरु हैं। उन्होंने गीता के विभिन्न श्लोकों के माध्यम से गुरु- शिष्य के संबंध का विस्तृत मार्गदर्शन किया। श्रद्धेय डॉ. पण्ड्याजी ने शिष्य के मन की जिज्ञासा, कौतुहल आदि विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु के प्रति सच्चा समर्पण भाव ही शिष्य को ऊँचा उठाता है और इसका भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं। उन्होंने इटानगर, कश्मीर, द्वारिका व कन्याकुमारी से निकलने वाले युवाक्रांति रथ को अक्टूबर के मध्य में निकलने की घोषणा की। ये चारों रथ विभिन्न राज्यों में युवाओं को रचनात्मक दिशा देते हुए जनवरी के अंत में नागपुर पहुँचेंगी, जहाँ देश भर के युवाओं को राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए संकल्पित कराये जायेंगे।
संस्था की अधिष्ठात्री श्रद्धेया शैलदीदीजी ने गुरु को भाव संवेदना की मूर्ति बताया और कहा कि गुरु वह कुम्हार है जो शिष्य के व्यक्तित्व को निखारता है और उसे सुगढ़ बनाता है। उन्होंने कहा कि गुरुपूर्णिमा आत्म मूल्यांकन का महापर्व है। उन्होंने कहा कि सद्गुरु शिष्य की श्रद्धा, प्रतिभा को उभारता है, जिससे शिष्य का स्तर जनसामान्य से ऊँचा उठता है। पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार के करोडों अनुयायियों को ऊँचा उठाया है। शैलदीदीजी ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए गुरु- शिष्य परंपरा पर विस्तृत जानकारी दी।
मुख्य कार्यक्रम के दौरान गायत्री परिवार के प्रमुखद्वय ने गुरुपूर्णिमा से श्रावणी पर्व तक चलने वाले वृक्षारोपण माह का सीता व अशोक के पौधे का पूजन कर शुभारंभ किया। इस अवसर पर देश- विदेश से आये हजारों शिष्यों ने पूज्य आचार्यश्री के युग निर्माण की संजीवनी विद्या, सद्विचार, सद्साहित्य को जन- जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर डॉ पण्ड्याजी व शैल दीदीजी ने हिन्दी, असमिया, पंजाबी की किताबों, प्रज्ञा गीतोंं की सीडी तथा शांतिकुंज पंचांग- २०१८ का विमोचन किया। वहीं शांतिकुंज में विद्यारंभ, उपनयन, मुण्डन, विवाह आदि संस्कार बड़ी संख्या में निःशुल्क संपन्न कराये गये। गुरुदीक्षा भी सैकड़ों की संख्या में हुई, जिसे स्वयं युगऋषि पूज्य गुरुदेव के प्रतिनिधि के रूप में डॉ पण्ड्या व शैलदीदी ने दी। मुख्य कार्यक्रम का मंच संचालन दिनेश पटेल ने किया। संगीत विभाग के युग गायकों द्वारा सुन्दर प्रस्तुतियाँ दी गयीं। सायं भव्य दीपमहायज्ञ हुआ।
भाव संवेदना की मूर्ति है सद्गुरु : शैलदीदीजी
हरिद्वार ९ जुलाई।
गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि सद्गुरु अपने शिष्य की पात्रता को विकसित करने के साथ उसके जीवन के अधूरेपन को दूर करने का कार्य करता है। सद्गुरु के ज्ञान का कोष सदैव भरा रहता है। वह ज्ञानवान, विवेकशील एवं भावनाओं से परिपूर्ण होता है।
श्रद्धेय डॉ. पण्ड्याजी गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में आयोजित गुरुपूर्णिमा पर्वोत्सव के प्रमुख कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर देश- विदेश के कई हजार अनुयायी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि सद्गुरु अपने शिष्य के प्रारब्ध को काटने वाला, साधनात्मक ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाला होता है। सद्गुरु दृश्य व अदृश्य जगत के ज्ञाता होते हैं और अपने शिष्यों को आने वाली समस्याओं से बचाते भी हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस, श्रीअरविन्द, महर्षि रमण, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी अपने शिष्यों को भवसागर से पार कराने वाले सद्गुरु हैं। उन्होंने गीता के विभिन्न श्लोकों के माध्यम से गुरु- शिष्य के संबंध का विस्तृत मार्गदर्शन किया। श्रद्धेय डॉ. पण्ड्याजी ने शिष्य के मन की जिज्ञासा, कौतुहल आदि विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु के प्रति सच्चा समर्पण भाव ही शिष्य को ऊँचा उठाता है और इसका भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं। उन्होंने इटानगर, कश्मीर, द्वारिका व कन्याकुमारी से निकलने वाले युवाक्रांति रथ को अक्टूबर के मध्य में निकलने की घोषणा की। ये चारों रथ विभिन्न राज्यों में युवाओं को रचनात्मक दिशा देते हुए जनवरी के अंत में नागपुर पहुँचेंगी, जहाँ देश भर के युवाओं को राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए संकल्पित कराये जायेंगे।
संस्था की अधिष्ठात्री श्रद्धेया शैलदीदीजी ने गुरु को भाव संवेदना की मूर्ति बताया और कहा कि गुरु वह कुम्हार है जो शिष्य के व्यक्तित्व को निखारता है और उसे सुगढ़ बनाता है। उन्होंने कहा कि गुरुपूर्णिमा आत्म मूल्यांकन का महापर्व है। उन्होंने कहा कि सद्गुरु शिष्य की श्रद्धा, प्रतिभा को उभारता है, जिससे शिष्य का स्तर जनसामान्य से ऊँचा उठता है। पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार के करोडों अनुयायियों को ऊँचा उठाया है। शैलदीदीजी ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए गुरु- शिष्य परंपरा पर विस्तृत जानकारी दी।
मुख्य कार्यक्रम के दौरान गायत्री परिवार के प्रमुखद्वय ने गुरुपूर्णिमा से श्रावणी पर्व तक चलने वाले वृक्षारोपण माह का सीता व अशोक के पौधे का पूजन कर शुभारंभ किया। इस अवसर पर देश- विदेश से आये हजारों शिष्यों ने पूज्य आचार्यश्री के युग निर्माण की संजीवनी विद्या, सद्विचार, सद्साहित्य को जन- जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर डॉ पण्ड्याजी व शैल दीदीजी ने हिन्दी, असमिया, पंजाबी की किताबों, प्रज्ञा गीतोंं की सीडी तथा शांतिकुंज पंचांग- २०१८ का विमोचन किया। वहीं शांतिकुंज में विद्यारंभ, उपनयन, मुण्डन, विवाह आदि संस्कार बड़ी संख्या में निःशुल्क संपन्न कराये गये। गुरुदीक्षा भी सैकड़ों की संख्या में हुई, जिसे स्वयं युगऋषि पूज्य गुरुदेव के प्रतिनिधि के रूप में डॉ पण्ड्या व शैलदीदी ने दी। मुख्य कार्यक्रम का मंच संचालन दिनेश पटेल ने किया। संगीत विभाग के युग गायकों द्वारा सुन्दर प्रस्तुतियाँ दी गयीं। सायं भव्य दीपमहायज्ञ हुआ।