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अब तो उसके मन में महर्षि के वचनों पर अपार श्रद्धा हो आयी थी। उसके मन में आया, एक चोरी और कर लूँ, फिर सदा के लिए चोरी बन्द करके अच्छे आदमी का जीवन जीऊँगा। उसने अवन्तिका राजा की महारानी का नौलखा हार पूर्णिमा की चाँदनी रात को अकेले जाकर चुराने का संकल्प लिया। ठीक पूर्णिमा की रात वह अपने साधनों के सहित राजमहल में पहुँच गया। रानी अट्टालिका में पलंग पर सोयी हुई थी। चाँदनी उसके सुन्दर...
Akhandjyoti Jul(1996)