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सन 1943 में पूज्य गुरुदेव ने एक पुस्तक लिखी “मित्रभाव बढ़ाने की कला”। यह सद्ज्ञान ग्रन्थ माला का तेईसवाँ पुष्प था। पुस्तक के नाम की ही तरह उनके उन दिनों अनेक मित्र थे। कुछ गाँव के साथी जो उन्हें मत्त जी कहते थे, घर जब मनचाहा, चले आते थे, कुछ कांग्रेस के कार्यकर्ता मित्र, कुछ आर्य समाज के धर्मोपदेशक मित्र कुछ पण्डित कुछ मुसलमान तो कुछ ईसाई मित्र। सभी से उनका परस्पर स्नेहभाव व सम्मान देने के गुण...


Akhandjyoti Aug(1990)