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एक था फूल एक था काँटा। दोनों हरे-भरे उद्यान में आजू–बाजू पल रहे थे। मानों प्रकृति ने उनको यह संदेश देने को नियुक्त किया हो कि इस संसार की बनावट उभयनिष्ठ है, यहाँ सब कुछ सुखद और सौंदर्ययुक्त ही नहीं दुःखद और कुरूपता भी उसका आवश्यक अंग है।

काँटे ने कहा प्यारे दोस्त? तुम्हें भी भगवान ने व्यर्थ ही बनाया कितने कोमल हो तुम कि शीत और ताप के हलके झोंके भी सहन नहीं कर...


Akhandjyoti Apr(1995)