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शरीर से रुग्ण और अति दुर्बल गोर्की, पर दुर्भाग्य; एक के बाद दूसरा आता गया। नाना-नानी के यहाँ पालन-पोषण हुआ। माता उसे इसी स्थिति में छोड़कर दूसरा विवाह करके अन्यत्र चली गई। मामा का दुर्व्यवहार बढ़ता चला, तो उसने 12 वर्ष की आयु से स्वावलंबी होने की बात सोची।

एक स्टीमर पर बरतन माँजने का ऐसा काम मिल गया, जिससे किसी प्रकार पेट भर जाता। दो वर्ष बाद उन्हें रसोई बनाने का काम मिल गया। साथियों...


Akhandjyoti Nov(2002)