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दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह के लड़कों को अंग्रेजों ने सरेआम फाँसी दी। उनका सिर काटकर थाली में रखा गया और अंग्रेजों द्वारा बादशाह के सामने पेश किया गया। बहादुरशाह न तो अधीर हुए और न शोकाकुल। उन्होंने लापरवाही के साथ कहा-”वीर पुरुष ऐसे ही दिन के लिये बच्चे पालते हैं।”

शोक और आघात के अवसर पर मनुष्य के धैर्य और विवेक की परीक्षा होती है। बहादुरशाह का धैर्य वीर पुरुषों के ही योग्य था।

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Akhandjyoti Apr(1988)