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भूख पीड़ित पाण्डव-द्रौपदी सहित बन में भटक रहे थे। जब स्वयं की ही क्षुधा शाँत होने की गुँजाइश न हो, ऐसे में महाक्रोधी ऋषि दुर्वासा और उनके दस हजार शिष्यों के आतिथ्य सत्कार के संदेश ने उन्हें और व्याकुल कर दिया था। आसन्न संकट की घड़ी थी। वे और अधिक सोचते इतने में महर्षि धौम्य का आगमन हुआ। स्थिति को समझकर महर्षि ने कहा-राजन्! देवाधिदेव भगवान सूर्य की आराधना करो। सूर्य उपासना सभी संकटों से त्राण दिलाने वाली...


Akhandjyoti Jun(1993)